Tuesday, 21 April 2009

बद्री विशाल परंपरा हजारों साल पुरानी ऐतिहासिक परंपरा आज भी यथावत् जारी

दुनियाभर में मशहूर हजारों साल पुरानी उत्तराखंड की ऐतिहासिक और धार्मिक गाडू घडी तेल कलश शोभा यात्रा की अनोखी परंपरा आज भी परंपरागत तरीके से चल रही है। उत्तराखंड के टिहरी के नरेश के राजमहल नरेन्द्र नगर में इस कार्यक्रम की शुरूआत होती है1 सर्वप्रथम विश्व ख्याति प्राप्त बद्रीनाथ धाम के कपाट खोलने की तिथि राजमहल के राजा वर्तमान में मनुजेन्द्र शाह. द्वारा घोषित की जाती है । तिथि घोषित होने के बाद महारानी वर्तमान में माला राजलक्ष्मी. और राजमहल की कुंवारी राज कन्याओं द्वारा तिल का तेल निकालकर गाडू घडे में रखा जाता है ।इस गाडू घडेको सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित किया जाता है1 भगवान् बद्री विशाल के कपाट खुलने से सोलह दिन पहले बद्रीनाथ धाम के पुजारियों का एक जत्था उनके मूल गांव डिम्मर सिमली. से गाजे बाजे के साथ राजमहल..नरेन्द्र नगर .टिहरी. के लिये रवाना होता है । राजमहल पहुंचने पर पुजारियों का भव्य स्वागत एवं आदर सत्कार किया जाता है1 इस जत्थे की अगुवायी डिम्मर उमा पंचायत के अध्यक्ष करते हैं। इस तेल कलश शोभा यात्रा का प्रतिनिधित्व डिम्मर. उमा. रवि ग्राम. जोशीमठ. सिरतोली. पाखी. जयकण्डी. नाकोट. कोला डुंग्री. राइखो. मज्याणी तथा लंगासू से आये पुजारी करते हैं। तेल कलश यात्रा का प्रथम चरण टिहरी के राजदरबार नरेन्द्र नगर से शुरू होकर रिषिकेश. शिवपुरी. देवप्रयाग तथा कर्णप्रयाग होते हुए पुजारियों के मूलग्राम डिम्मर में समाप्त होता है1यहां पर स्थानीय पुजारी की देखरेखमें में नित्य पूजा एवं भाग के विधि..विधान के साथ चौरी नामक स्थान पर तेल कलश को श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ रखा जाता है1 यहीं पर 27 अप्रैल तक नित्य पूजा एवं भाग की परंपरा चलती है।गाडू घडी तेल कलश यात्रा के दूसरे चरण में 28 अप्रैल को डिम्मर कर्णप्रयाग. के लक्ष्मी नारायण एवं खाडू देवता के मंदिर से सुबह आठ बजे बद्रीनाथ धाम के लिये रवाना होती है1 दूसरे चरएण की यात्रा प्रारंभ होकर शिमली बाजार पहुंचने पर इसयात्रा का भव्य स्वागत एवं पूजा..अर्चना श्रृद्धालुओं द्वारा की जाती है। यहां पर से तेल कलश शोभा यात्रा कर्णप्रयागकालेश्वर. लंगासू. नंदप्रयाग में ठाणा. चमोली. विरही. पीपलकोटी. पाखी तथा टंगणों आदि स्थानों से होते हुए रात्रि विश्राम के लिये जोशीमठ के नृसिंह मंदिर में पहुंचती है । मार्ग में यात्रा को अल्प समय के लिये भक्तों के दर्शनार्थ रोका जाता है तथा रात में पूजा..अर्चना की जाती है । अगले दिन प्रात तेल कलश शोभा यात्रा श्री बद्रीनाथ जी के मुख्य पुजारी श्री रावल जी तथा शंकराचार्य की गद्दी पांडुकेशर के लिये रवाना होती है। पांडुकेशर में रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन 30 अप्रैल को सुबह तेल कलश. रावल जी. शंकराचार्य की गद्दी एवं उद्धव जी की डोली के साथ अपने अंतिम पड$ाव भगवान् बद्री विशाल जी के लिये रवाना हो जाती है । जहां पर भगवान् बद्री विशाल के कपाट खुलने तक रात भर पूजा-अर्चना की जाती है। अगले दिन भोर में भगवान् बद्रीनाथ जी के कपाट खुलने पर बद्रीनाथ जी के अभिषेक पर प्रतिदिन यह तिल का तेल उपयोग में लाया जाता है।

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