Saturday, 18 April 2009

अब न रहे आश्रम और न रहीं धर्मशालाएं

उत्तरकाशी- व्यवसायिकता के इस दौर में तीर्थाटन से पैसे कमाने की होड़ में यात्रा मार्ग की चट्टियां, यात्रा पड़ाव तथा धर्मशालाएं और आश्रम होटलों में त4दील होने से आर्थिक रूप से कमजोर यात्री खुले आसमान के नीचे सड़क किनारे रात बिताने को मजबूर हैं।वर्षों पूर्व सड़कें न होने पर यमुनोत्री और गंगोत्री की तीर्थयात्रा पर यात्रा ऋषिकेश और धरासू से ही पैदल आते थे। ऐसे में यात्रियों की सुविधा और सेवा के लिए मार्ग में कई चट्टियां और धर्मशालाएं स्थापित की गई थीं। समय के साथ जैसे-जैसे सड़कें इन तीर्थधामों के करीब पहुंचीं, वैसे-वैसे पैसा कमाने की होड़ में बहुमंजिला होटलों के दबाव में चट्टियां अपना अस्तित्व खो बैठीं। तीर्थयात्रियों और साधु सन्यासियों के रुकने के लिए धर्मात्माओं द्वारा बनवायी गई तमाम धर्मशालाएं और आश्रम या तो होटलों का रूप धर चुके हैं, या फिर अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए हैं। यमुनोत्री मार्ग पर हनुमानचट्टी, सयानाचट्टी, जानकीचट्टी और फूलचट्टी आदि चट्टियों पर बहुमंजिला होटल तो बन गए, किंतु धर्मशालाएं लुप्त हो गईं। कई धर्मशालाएं और आश्रम जहां सुविधा संपन्न होटल बन गए हैं, वहीं जिला मु2यालय पर जयपुर धर्मशाला में अवैध क4जों के बाद सिर्फ बोर्ड ही शेष रह गया है। ऐसे में अपनी जमा पूंजी लेकर तीर्थयात्रा पर आने वाले गरीब यात्री सीजन में सड़क किनारे और मैदान में खुले आसमान के नीचे रात गुजारते देखे जा सकते हैं।

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