Tuesday, 17 March 2009

जाना होगा हर डगर, नरेंद्रनगर से रामनगर

Mar 17, देहरादून। पौड़ी लोकसभा सीट का चुनावी भूगोल बदल गया है। अब मतदाता तक पहुंचने के लिए नरेंद्रनगर से रामनगर तक की दूरी नापनी होगी। तराई के मुकाबले पहाड़ों की खड़ी चढ़ाई पर चढ़ने और उतरने में प्रत्याशियों को खासा पसीना बहाना पड़ेगा। पौड़ी सीट में शत-प्रतिशत पहाड़ी क्षेत्र है। कोटद्वार व रामनगर के कुछ क्षेत्र ही ऐसे हैं, जहां रास्ते घुमावदार नहीं हैं। ऐसे में पूरे क्षेत्र का चुनावी सफर किसी चुनौती से कम नहीं है। नीति-माणा जैसे सीमांत गांवों से लेकर स्वर्गाश्रम तक यह सीट फैली है। बड़े शहरों की तुलना में कस्बों की संख्या अधिक है। गंगा, रामगंगा और अलकनंदा के साथ ही बद्रीनाथ व केदारनाथ समेत अनेक प्रयाग भी इस सीट में हैं। ऐसे में चुनाव प्रचार तीर्थयात्रा से कम नहीं होगा। पहाड़ में अधिकतर क्षेत्रों में पैदल भ्रमण चुनावी जरूरत में शामिल रहेगा। हर क्षेत्र तक पहुंचने में अन्य सीटों की तुलना में अधिक समय की आवश्यकता भी होगी। संसदीय क्षेत्र में पांच जिलों की विधानसभा सीटें शामिल हैं। चमोली की सभी तीन बद्रीनाथ, थराली व कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग की रुद्रप्रयाग व केदारनाथ तथा पौड़ी की सभी छह विधानसभा यमकेश्वर, पौड़ी, श्रीनगर, चौबंट्टाखाल, लैंसडौन व कोटद्वार इस सीट में शामिल है। इसके साथ ही टिहरी गढ़वाल की देवप्रयाग व नरेंद्रनगर तथा नैनीताल की रामनगर विधानसभाएं इस सीट में पहली बार शामिल हुई हैं। इस तरह पौड़ी लोकसभा सीट पांच जिलों नैनीताल, टिहरी, चमोली, पौड़ी व रुद्रप्रयाग तक फैल चुकी है। पौड़ी सीट की भौगोलिक स्थिति अब इस तरह की बन गई है कि चुनाव मैदान में उतरने वालों के सामने कई व्यवहारिक दिक्कतें रहेंगी। पांच अलग-अलग जिलों की विधानसभा सीटें इसमें समाहित हैं और सभी की अलग-अलग जरूरतें हैं। ऐसे में इस सीट की सामूहिक आवश्यकताओं का आंकलन करना खासा मुश्किल होगा। देवप्रयाग व नरेंद्रनगर की अलग जरूरतें होंगी तो रामनगर की समस्याएं इससे भिन्न हो सकती हैं। चमोली व रुद्रप्रयाग का मिजाज कुछ अलग रहेगा तो पौड़ी का मूड भी नए हालात में बदल सकता है। ऐसे में हर जिले के लिए अलग कार्ययोजना बनाने की बाध्यता भी बनती दिख रही है। पौड़ी सीट का बदला भूगोल क्या गुल खिलाएगा, यह तो भविष्य के गर्त में है। इसके बावजूद चुनावी समर में कूदे महारथी सीट का मिजाज भांपते हुए तूफानी दौरों पर जुट गए हैं। आखिर ऐसा हो भी क्यों नहीं, कठिन चुनावी सफर में हर क्षेत्र में पहुंचने की मशक्कत जो बढ़ गई है।

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